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जो सुख देकर सुख चाहता है,वही मानव है


✍️ कांतिलाल मांडोत की कलम से……

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।वह जिस समाज मे जीता है,उस समाज से कुछ लेता है तो कुछ देता भी है।दानव और मानव दोनों ही सुख चाहते है दुःख कोई नही चाहता।जो दुःख देकर सुख चाहता है,वह दानव है और जो सुख देकर सुख चाहता है,वही मानव है।मानव की शक्ल में दानव मानव दोनों ही रहते है।जो अपना सुख देकर दूसरे का दुःख अपनाता है,वह मानव से भी ऊपर देवत्व को जगाता है।जो मात्र लेना ही लेना है और दुःख देता है,वह अपने मे दानव का भाव पैदा करता है।मेवाड़ के राणा प्रताप की सेना में सबसे अधिक सिपाही भील जाति के थे।राम वनवासी वानरों एवं  भालुओं का सहयोग लिया जो कदाचित दक्षिण भारतीय वनवासी जाति ही थी।सागर पार करने के लिए पत्थर की नाव नही बनाई जाती, बल्कि उसी लकड़ी का प्रयोग करते है जो जलाने के काम आती है।जहाँ स्वार्थ है,वहां सहयोग की नींव ही नही बन पाती तो सुख का भवन कैसे बनेगा?अधिकांशतः यही देखा जाता है कि स्वार्थ पूर्ण होने पर सारा परिवेश बदल जाता है।वर्तमान युग मे तो स्वार्थ अपने चरम पर पहुंच चुका है।परिवार में भी स्वार्थ ही पसरा है।भाई बहन माता पिता और भाई भाई में स्वार्थ के कारण आपसी खून के रिश्तों में भी दीवार खड़ी हो गई है।एक दूसरे का कोई औचित्य नही है।जिसे देखो वह हर कार्य मे स्वार्थ पहले देखता है।सहयोग की भावना है तो कही कुछ भी कमी आने वाली नही है।सहयोग के बिना समाज का काम नही चल सकता।कोई यह सोचे कि मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नही है तो यह उसका जूठा दम्भ है।समय का कोई भरोसा नही है सम्पत्ति की जिस चकाचौन्द में मानव पगलाया हुआ रहता है,वह कब विपत्ति की काली छांव बन जाये कोई कुछ नही कह सकता।मनुष्य यदि संकीर्णता की धारा को तोड़ दे तो इस धरती पर स्वर्ग उतर सकता है।भारत के गांवों में आज भी सहयोग की भावना है।किसी के घर का छप्पर लोग मिलकर उठाते है।लेकिन महानगरो की स्थिति तो बहुत बदतर हो चुकी है।भाषण और कंधा देने वाले भी बिना पैसे के नही मिलते।आज आपसी स्नेह और सहयोग की सबसे बडी जरूरत है।सीता के मन मे सास की सेवा से वंचित रहने की अत्यधिक पीड़ा थी।क्या आज यह बात दिखाई देती है?आज सास बहू के सहयोग तो चाहती है मगर क्या वह वैसा ही प्यार अपनी बहुओं को दे पाती है?
             

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