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सामायिक समभाव की साधना है-जिनेन्द्रमुनि मसा


गोगुन्दा ( कांतिलाल मांडोत) ! समत्व में जितनी भी अशुभ प्रवृतियां है।वे सब पलायन कर जाती है और साधक में आत्मसम्मान मुखर उठता है।जो जितना आत्म स्वभाव में रमण करेगा ,वह उतना ही विषय कषाय तथा राग द्वेष से विरत रहेगा।जितने भी महापुरुष हुए है। सबने समत्व को स्वीकारा है।वास्तव में जब तक आप में किसी भी प्राणी के प्रति राग या द्वेष क्रोध या घृणा लगाव या अलगाव की स्थिति है,तब तक आप समत्व से दूर है।समत्व की साधना में वैषम्यमयी भावनाएं समाप्त होने लगती है। कषायों का आवरण आत्मा पर आवृत है,वे समत्व के माध्यम से जब अनावृत हो जाते है तब आत्म स्वरूप प्रकट होने लगता है।उपरोक्त विचार कड़िया स्थानक भवन में आगन्तुको के समक्ष जिनेन्द्रमुनि मसा ने विचार व्यक्त किये।मुनि ने कहा आत्म स्वरूप की प्रतीति ही सामायिक का प्रतिफल कहा जा सकता है।जीवन मे ऐसे अनेक उदाहरण देखने सुनने को मिलते है।जिनमे समत्वभाव की प्रतीति उजागर होती है।समभाव की पराकाष्ठा में साधक केवल मनुष्य के प्रति ही नही,समग्र प्राणियों के प्रति समत्वभाव होता है।स्वरूप की दृष्टि से विश्व की समस्त आत्माएं एक है।न कोई बड़ा है और न कोई छोटा।न कोई मित्र और न कोई दुश्मन।जैन संत ने कहा साधक सामायिक की विशुद्ध साधना से कर्म श्रृंखला को काटकर केवल ज्ञान प्राप्ति करता  है।सामायिक के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि एक लाख स्वर्ण मुद्राओ का प्रतिदिन दान करने वाला दानी और दो घड़ी शुद्ध सामायिक की साधना करने वाले साधक इन दोनों में यदि कोई बड़ा है तो वह है दो घड़ी शुद्ध सामायिक में लीन रहने वाला साधक।सामायिक में आत्मा में समाया परमात्मा प्रकट हो सकता है।यह परमात्मा बनने की उत्कृष्ट आध्यात्मिक साधना है।जैन मुनि ने कहा वास्तव में जीवन चर्या में सामायिक का यदि अभाव है तो ऐसा व्यक्ति विषमताओं संकीर्णताओं, तनावों द्वन्दों आवेगों आदि में सुलगता रहेगा।कामनाओ और लालसाओं के भंवर झाल में उलझता रहेगा।उसके व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अभाव होता जाएगा।साधक को सामायिक के प्रति कभी भी उपेक्षा भाव नही लाना चाहिए। सौभाग्य महातीर्थ धाम कड़िया में मदन मुनि मसा की तीसरी पुण्यतिथि के कार्यक्रम में निमंत्रण स्वरूप पत्रिका भेंट कर आशीवार्द ग्रहण करते संघ के पदाधिकारियों में सोहन मादरेचा निर्मल सिंघवी आदि श्रावक  उपस्थित रहे।

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