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मेनार में ऐतिहासिक महापर्व जमराबिज इस बार 15 मार्च को, तैयारियों में जूटे ग्रामीण

बारूद के साथ खेलेंगे होली, नंगी तलवारों से होगी जबरी गैर, शौर्य व वीरता के प्रतीक के रूप में पिछले 450 सालों से ग्रामीण यह उत्सव मना रहे

महाराणा ने प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को लाल जाजम, रणबांकुरा ढोल एवं मेवाड़ की 17वीं उमराव की उपाधि दी


रिपोर्ट
कन्हैया लाल मेनारिया बांसडा।

बांसडा……. उमंग-उल्लास और रंग अबीर का त्यौहार होली 13 मार्च को है। होली पर्व पर राजस्थान में अनेकों उत्सव आयोजित होते हैं। होली पर सब रंग, अबीर-गुलाल से होली खेलते हैं परन्तु मेवाड़ में एक गांव ऐसा भी है, जहां होली बारूद से होली खेली जाती है, और इस तरह की होली वहां पिछले करीब 450 वर्षों से अनवरत खेली जा रही है। उस गांव का नाम है मेनार व इस उत्सव का नाम है ‘जमरा बीज’ है। इस वर्ष ऐतिहासिक महापर्व जमराबिज मेनार में 15 मार्च को भव्य आतिशबाजी, बारूद के साथ मनाया जाएगा। जिसके लिए पूरे गांव को सतरंगी रोशनियों से सजाया जाएगा।
              उदयपुर चित्तौड़गढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग 48 पर उदयपुर से 40 किमी. दूर यह गांव पहाड़ी पर दो जलाशयों के बीच स्थित है। यह गांव बर्ड विलेज के नाम से भी विख्यात है और आईबीए के लिए नामित हो चुका है तथा दोनो तालाब वैटलैंड की श्रेणी में आते है। यहां अधिकांशतः मेनारिया ब्राह्मण निवास करते हैं। गांव की वर्तमान आबादी लगभग 10 हजार है। मेनारिया जाति से ब्राह्मण परन्तु स्वभाव से क्षत्रिय और बहादुर हैं। ज्यादातर लोग कृषि या दुग्ध का व्यवसाय करते हैं, तथा विदेशो में अपने हाथों से लज़ीज़ खाना बनाने के लिए भी प्रसिद्ध है।
         इस पर्व को लेकर रविवार से ओंकारेश्वर चौक में युवाओं द्वारा तलवारों से गैर नृत्य शुरू होने वाला है, जो जमराबिज तक चलेगा, जिसमें कई युवा भी गैर नृत्य सीखेंगे। वही युवा व ग्रामीण तोप, तलवार, बंदूको की साफ सफाई व मरम्मत करने में जुटे हुए हैं। इस आयोजन को लेकर गांव में उत्साह एवं जोश का माहौल है और ग्रामीण इस ऐतिहासिक आयोजन की तैयारियों में जुट गए है। I

मेनार की बारूद की होली का इतिहास

ऐतिहासिक जमराबिज का इतिहास महाराणा अमर सिंह प्रथम के समय की एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है इस उत्सव का संबंध। 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ के जन मानस में राष्ट्र भक्ति की ऐसी लहर उठी कि हर गांव मुगल शासकों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। जगह-जगह मुगलों की चौकियां नष्ट की जाने लगी। मुगलों की एक मुख्य चौकी ऊंटाला वल्लभगढ़ (वर्तमान वल्लभनगर) में स्थापित थी, जिसकी उपचौकी मेनार में थी। जिसका सूबेदार अत्यन्त क्रूर था और आस-पास के ग्रामवासियों को तंग किया करता था। महाराणा प्रताप के निधन के बाद मुगलों के आतंक से त्रस्त होकर मेनार के मेनारिया ब्राह्मणों ने मुगल सेना को हटाने की रणनीति बनाई।एक दिन समाज के पंचों ने गोपनीय बैठक बुलाकर इस चौकी को नष्ट करने की योजना तैयार की। होली के दूसरे दिन जमरा बीज पर मेनारिया वीरों ने अचानक मुगलों पर हमला कर दिया और सारी मुगल सेना को मौत के घाट उतार दिया। वह दिन विक्रम संवत 1657 (सन 1600) चैत्र सुदी द्वितीया का था। युद्ध में मेनारिया ब्राह्मण भी वीरगति को प्राप्त हुए थे। तब मेवाड़ महाराणा अमर सिंह को इस घटना का पता चला तो प्रसन्न होकर मेनार मेनारिया ब्राह्मणों को शाही लाल जाजम, रणबांकुरा ढोल, सिर पर कलंकी धारण, ठाकुर की पदवी एवं मेवाड़ की 17वीं उमराव की उपाधि दी। साथ ही आजादी तक गांव की 52 हज़ार बीघा जमीन पर लगान वसूला नहीं जाएगा। उस घटना की याद में शौर्य व वीरता के प्रतीक के रूप में पिछले 450 वर्षों से यह उत्सव मनाया जा रहा है। इस दिन मेहमाननवाजी भी खूब होती है। तथा ग्रामीण सुरक्षा व्यवस्था स्वयं देखते है, इतना बारूद व तोपे चलने के बाद भी माँ जगदंबा की कृपा से कभी कोई हादसा होता नहीं है।

अनोखी है तलवारों की गेर

मेवाड़ व मारवाड़ क्षेत्र में होली के अवसर पर लोक नृत्य गेर का लगभग सभी ग्रामों में आयोजन होता है। यह पूरे फाल्गुन मास चलता है, परंतु मेनार की गेर अन्य स्थानों से विशिष्ट इसलिए है क्योंकि अन्य जगह लकड़ी के डंडों से नृत्य होता है जबकि मेनार में ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा से सुसज्जित होकर यही गेर तलवारो से खेलते है। इसमें यहां के युवक, ग्रामीण एक हाथ में तलवार व दूसरे में लाठी घुमाते हुए ओंकारेश्वर चौक के वृत्ताकार में नृत्य करते हैं। एक रात के लिए मेनार में युद्ध सा वातावरण जीवंत हो उठता है, कही तोपे आग उगल रही है, तो कही बंदूको से बारूद दागा जा रहा है। इसी रात में लाखों रुपए के पटाखों से आतिशबाजी की जाती है।
       इतिहास वाचन के बाद देर रात गेर नृत्य चलता है, तत्पश्चात अंत में आग का गोटा घुमाना व तलवारबाजी ग्रामीण करते हैं। इस प्रकार इस शौर्य के उत्सव का समापन होता है। इससे पूर्व दिन में ओंकारेश्वर चौक में लाल जाजम पर अमल कसुबा रस्म अदा की जाती है और पूरे दिन रात लगातार रणबांकुरा ढोल बजता रहता है।
                 450 वर्ष बाद भी इस उत्सव के आयोजन के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। आज भी जमरा बीज पर ग्राम की विवाहित बहन-बेटियां और युवा जो अधिकांशतः खाड़ी देशों या मुम्बई में या बाहर नौकरी करते हैं, जो इस आयोजन में शामिल होने के लिए जरूर आते हैं।

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