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दिल्ली विधानसभा में कमल खिलने के बाद छतीसगढ़ निकाय चुनाव में भी भाजपा की जीत


✍️कांतिलाल मांडोत की कलम से..

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद छतीसगढ़ निकाय चुनाव में कमल खिलने से भाजपा कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर है।कांग्रेस की लगातार पराजय से कांग्रेसियों के चेहरे मुर्झाये हुए है।कांग्रेस का घटता जनाधार पर दिग्गज नेताओं को मंथन करने की आवश्यकता है।भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश मे चारो खाने चित कर रही है।वही कांग्रेस हार का सामना कर रही है।कांग्रेस जिन मुद्दों को उछाल रही है।उसका जनता के लिए कोई मायने नही है।कांग्रेस की उखड़ती जड़ो के लिए कांग्रेस की कार्यप्रणाली का बुरा असर दिखाई दे रहा है।राहुल गांधी के पास भाजपा को घेरने का कोई ठोस मुद्दा नही है।भाजपा के कार्यकर्ता एवं नेताओ का मकसद विकास की वैतरणी पार करनी है।वैसे रणनीति कांग्रेस की नही है अभी जिस राज्य में कांग्रेस सत्ता में है।वहा की स्थिति वैसी ही है,जैसी पहले थी।कांग्रेस के पास एम ऑब्जेक्ट नही है।पंचायत स्तर पर भी यही हाल कांग्रेस का है।छतीसगढ़ में14 नगर निगमो में भाजपा ने परचम लहराया है वही कांग्रेस का 10 नगर निगम में खाता भी नही खुला है।रायपुर नगर निगमो में 15 वर्ष का वनवास खत्म कर 10 नगर निगम में जीत हासिल की है।वही कांग्रेस की पराजय से कांग्रेस खेमे में मायूसी है।वही बात की जाय तो धमतरी,राजनांदगांव बिलासपुर  दुर्ग कोरबा जगदलपुर अम्बिकापुर  रायपुर चिरमिरी में कमल खिला है।49 नगर पालिका परिषदों में 35 भाजपा प्रत्याशियों की विजय हुई है।वही आठ पर कांग्रेस और पांच पर अन्य विजय हुए है।भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता में अहम रोल सुशासन और विकास मॉडल है।मेक इन इंडिया और मएफ इन इंडिया की महत्वपूर्ण योजना ने लोगो ने रोजगार ही सर्जन नही किया है।उसमें बेहतर भविष्य के लिए अपने सपने साकार कर रहे है।कांग्रेस का विजन नही है।कांग्रेस ने उन मुद्दों को हवा दी है जिसमे कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से जनता किनारा करती दिखाई दे रही है।हरियाणा,महाराष्ट्र और दिल्ली उसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियों से घबरा कर मत्तदाताओ ने कांग्रेस से दूरियां बनाना शुरू कर दिया है।कांग्रेस को मंथन करने की जरूरत है।
             

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