
सर्वाधिक महत्व पूर्ण है व्यक्ति का दृष्टि कोण जैसा व्यक्ति का दृष्टिकोण होगा उसका चरित्र वैसा ही बनता जाएगा। अतः मानव को अपने सच्चरित्र का निर्माण करने के लिये सर्व प्रथम अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना चाहिये। जीवन मात्र तुच्छ अर्थोमें व्यय होकर हर जाए तो वह जीवन का दुरुपयोग ही होगा। दृष्टि कोण बदलने केलिये इस तथ्यको अपने सामने रखकर सोचना चाहिये । हम अपनी सभी प्रवृतियों में तभी परिवर्तन ला सकेंगे जब हम किसी उच्च लक्ष्य के लिये अपने को समर्पित करेंगे। पेट पेटी और परिवार के परिचक्र में ही हम अपनी सारी योग्यताओं को निहित कर देते हैं तो यह एक सामान्य विधि ही होगी जिस में मानव मात्र अपना निर्वाह कर रहा है । पशुता और पैशाचिकता जैसी दुरवर्तियो का निर्माण स्वार्थपूर्ण विचार धारा में ही होता रहता है ।
स्वार्थ से परे किसी उच्च लक्ष्य के लिये भी हम जिए ऐसा एक विचार यदि मानस में दृढ़ता के साथ स्थापित होजाता है तो जीवन की गतिविधियों में एक क्रान्ति कारी परिवर्तन सहज ही घटित होता चला जाएगा ।
पश्चिम के अनुकरण ने हमे निपट स्वार्थी बनाकर रख दिया है, भौतिक सुख सुविधाएं अपना लक्ष्य बन गई है। आज मानव उसी में अपने आपको खपाये जा रहा है। यही कारण है कि हमारे देश में उच्च चरित्र वान तेजस्वी मार्ग दर्शक व्यक्तित्व तैयार नहीं हो रहे हैं। स्वार्थ लालसाएं सभी को खाए जारही है । प्रत्येक व्यक्ति मात्र अपनी सोचने में लगा है। ऐसा स्वार्थी समाज भारत में पहले कभी नहीं रहा। हम स्वतन्त्र होने के साथ इतने स्वार्थी भी होगये हैं कि जीवन मूल्य ही समाप्त होते जारहे हैं। अपने दृष्टिकोण में एक महान विचार धारा का सृजन आवश्यक है । अन्यथा अपने पतन का दौर निरन्तर विकराल होता चला जाएगा ।








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