
जैसे जैसे लोभ होता जाता है वैसे-वैसे लोभ बढ़ता जाता है। तृष्णा आकाश के समान अनंत है। जीवन का अन्त निश्चित है। परंतु लोभ का नहीं। लोभ में वशीभुत होकर मानव जीवन स्वाह कर देते है। त्रिलोक की संपति देकर भी मानव जन्म का एक एक पल नही खरीदा जा सकता है।संपति देकर भी एक भी पल नहीं खरीदा जा सकता। सद्कार्य करने पर जो बाधा डालता है, वह उसके पाप का उदय है। क्रोध तो प्रिती का विनाशक है। मान से विनय का, माया से सरलता का, परंतु लोभ तो सभी सदगुणो का नाश कर सकता है। लोभ का भूत सवार होने पर मानव, दानब बन जाता है । जिस प्रकार कुत्ते के कीडे पड़ने पर अशांत बन कर भटकता है, उसी प्रकार लोभ के कीटाणुओं से शांति भंग हो जाती है और आत्मा की दुर्गति होती है।
लोभ रूपी पिशाच ने पारिवारीक खुन के रिश्ते मे भी कडवाहट घोल दी है, आपसी खुन के रिश्ते भी कडवाहट का रूप ले लिया है। भाई-बहन, माता-पिता सभी स्वार्थ और लोभ के रिश्ते बन गये है। घन की मुख्य भूमिका परिवार में पनप रही है। वह धन भी जीवन के लिए अभिशाप है। जो प्रेम सदभावना के पावन रिश्तों को नष्ट कर देता है। मानव-मानव आपस में खुन का प्यासा है। नीति को भुल रहा है। अनिति मात्र परिवार मे अशांति ही पैदा करता है।
तृष्णा के जाल से मुक्त नहीं हुए तो अतृप्त आत्मा बनकर उसके आसपास भटकती रहेगी। धन संपति का संयोग भागने दौडने से नहीं बनता। किंतु पुण्यपार्जन से होता है। पशु-पक्षी के पास एक जुन का भी संग्रह नहीं है। फिर भी चैन की नींद सोते है। इंसान के पास इतना होते हुए भी अशांत है। अशांति से कई रोग उत्पन्न होते है।
जब तक संतोष नहीं आता तब तक स्थाई शांति असंभव है। धन से सुख की सामग्री खरीद सकते है। किंतु शांति नहीं। धन रोकने से कभी नहीं रूकता और मनौती से आता भी नहीं है। त्याग में जो सुख है, जो सच्चा आनंद है, वह अन्य किसी में नहीं, शुभ कर्मों से बढ़कर अपने लिए और कोई संपति नहीं, ऐसा विचार जिसके मन में आता है। वहीं परम पिता परमेश्वर का सच्चा उपासक है। धन से बढकर धन को महत्त्व देकर धर्म की रक्षा में घन लगाना चाहिए। अतः धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व न्यौछावर करना पडे तो भी हर पल तैयार रहें। यही शिक्षा सभी धर्मो में समान रूप से दी है।








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