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व्यग्रता ने मानव को अशान्त और उद्वेलित बना  कर रख दिया है


✍️कांतिलाल मांडोत ( गोगुंदा ) की कलम से….

व्यग्रता एक मानसिक व्याधि है जो मानव को अशान्त और उद्वेलित बना कर रख देती है। आज यह व्याधि महामारी की तरह पूरे विश्व में फैलती जारही है । मानव मस्तिष्क कल्पनाओं का समुद्र है। कल्पनाओं की लहरे उसमें निरन्तर उठती रहती है। यह मानव की योग्यता पर आधारित है कि वह कौन सी कल्पना को साकार करे और कैसे करे ? चिन्तन करने से व्यक्ति को हेय ज्ञेय और उपादेय की दिशा मिलती है। श्रेष्ठ और सफल महा पुरुषों का अनुभव भी इसमें सहायक बन सकता है। बहुमुखी और तल स्पर्शी चिन्तन के द्वारा जो दिशा मिले यदि मानव उस दिशा में ही विवेक पूर्वक सक्रिय हों तो सफलता श्रेष्ठता और आनन्द उसे निश्चित रूप से प्राप्त होंगे किन्तु मानव को आज चिन्तन और परामर्श के लिये समय नहीं है वह शीघ्रता पूर्वक हडबड़ी में जो मन में आया कर लेना चाहता है यही वह व्यग्रता है जो उसे असफल अशान्त और उद्वेलित बना देती है। भगवान महावीर ने प्रत्येक मानव को एक महत्व पूर्ण संदेश दिया कि मानव यदि आत्म शान्ति चाहता है तो चलना, बैठना, उठना, खाना, सोना, बोलना आदि सारी क्रियाएं यत्ला पूर्वक कर, धैर्य के साथ कर ।
आत्म संतोष भंग नहीं होना चाहिये क्यों कि मानव जीवन का आनन्द आत्म शान्ति में ही निहित है।
आत्म संतोष का अर्थ यह नहीं कि हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएं । आत्म संतोषका अर्थ है, हम कठोर से कठोर श्रम और प्रयत्न भी करें किन्तु धैर्य और विवेक पूर्वक करें। वही करे जिसे श्रम पूर्वक ही सही किन्तु पूर्ण करने की अपने में योग्यता हो और अपने पास आवश्यक साधन हों।
योग्यता और साधन से परे कार्य होंतो उसे तत्काल हाथ में नहीं लेना चाहिये। मानव तनावों में जीने को इसी लिये मजबूर है कि वह कल्पनाओं के साथ बहने लगता है। अपने बलाबल का विचार किये बिना किसी भी तरफ हाथ पैर मारता रहता है तो उसे तो अशान्त और उद्वेलित होना ही है।वर्तमान में लोगो के पास लायक कार्य नही होने से परेशानी बढ़ जाती है।घर मे एक सदस्य कमाने वाला है और दस व्यक्ति खाने वाले है तो व्यग्रता बढ़ना स्वाभाविक है।परिवार के परिवार उजड़ जाते है।उचित नौकरी नही मिलने से परिवार में कितनी अशांति पसर जाती है।पैसे की समस्या सबसे बड़ी समस्या है।इसमें पूरे परिवार की समस्या बढ़ जाती है।वर्तमान समय मे पारिवारिक समस्या के जाल बुंनने वाले अपने समाज में ही बैठे है।इनको दरकिनार किये बिना परिवार में व्यग्रता बढ़ती जाती है।कदम कदम पर कठिनाइयों की चिंता लगी रहती है।व्यग्र इंसान अनुचित करने के लिए लालायित रहते है।।मनुष्य को चाहिए कि समस्याओ का जाल नही बुने, जिससे व्यग्रता का नामोनिशान ही मिट सकता है।
      

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