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जिसका चरित्र पर्वत की तरह अचल है वह चित्रकूट है : वीरेन्द्र शास्त्री

खैरवाड़ा : राम कथा में उमड़ा जन सैलाब
खैरवाड़ा (धरणेन्द्र जैन)। श्री राम मंदिर के सत्संग सभागार में राम दिव्य कथा के दसवे दिन कथा वाचक श्री वीरेंद्र कुमार शास्त्री ने वाल्मिक आश्रम, दशरथ मरण, और भरत चरित्र का सुंदर वर्णन किया । दिव्य राम कथा के प्रवक्ता महान शिक्षाविद जन जन में प्रिय जगदीश व्यास के अनुसार श्री शास्त्री ने कहा कि भगवान का निवास 14 स्थानों पर रहता है। भगवान राम 13 वर्ष तक चित्रकूट में रहे। वियोग की 10 अवस्था होती है। जिन्हें राम वैदे ही प्रिय नहीं है वह परम विद्रोही है ।उपदेश देने से पहले उपदेश का पालन करना चाहिए। जहां समर्पण होता है वहां प्रभु का निवास होता है। 14 वर्ष तक अयोध्या में न तो किसी की संतान हुई और न वहां रोशनी की गई। भगवान राम जानकी और लक्ष्मण सहित वाल्मीकि आश्रम पर जाते हैं। वहां से वे चित्रकूट और अनुसुया  आश्रम पर  जाकर के निवास करते हैं। सुमंत के बिना राम से वापस अयोध्या लौटने पर दशरथ मूर्छित हो जाते हैं और उन्हें श्रवण कुमार के दिए हुए श्राप याद आ जाते हैं और श्राप का वर्णन अपनी पत्नी कोशल्या को कहते हुए बैकुंठ लोक को पहुंच जाते हैं। भरत को उनके ननिहाल से वापस बुलाया जाता है और वशिष्ठ ऋषि के द्वारा राज्याभिषेक के लिए कहते हैं तब भरत जी ने कहा कि जो राम और वैदेही को प्रिय नहीं है वह परम विद्रोही है। अतः में इस राज्याभिषेक को स्वीकार नहीं करता हूं और भरत अयोध्यावासियों  को लेकर राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट जाते हैं। निषाद उन्हें शत्रु समझ कर अपनी सेना तैयार करता है परंतउसेभ्रम दूर  हो जाता है
जाता है और वह निषाद राज के साथ चित्रकूट पर जाकर   राम और जानकी के  चरणों में साष्टांग प्रणाम करते हैं और निवेदन करते हैं कि आप लक्ष्मण जानकी को भेज दो मैं आपके साथ चलुंगा ।राम के कहने पर यह तो नीति है अतः वापस अयोध्या जाओ। मैं 14 वर्ष होने पर 
अयोध्या लौट आऊंगा ।अंत में बहुत दुखी मन से भारत  राम की चरण पादुका लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं ।मध्य में बैंजो सिरदास तथा तबले पर श्री राकेश की धुन पर “भरत चलो चित्रकूट राम को मनाने तथा प्रेम जब अनंत हो गया तो रोम रोम संत हो गया “का सुंदर भजन प्रस्तुति की गई जिससे एक आध्यात्मिक वर्षा हुई और सब उसे राम के स्वरूप का आनंद लेकिन लेने लगे। अंत में  शांतिलाल व्यास ,शिव शंकर ,शंकर लाल हरीश, द्वारका प्रसाद जगदीश रणछोड़ लाल सुख दास जी महाराज शीतल तारा और कांता  जसू के चरण धोक के बाद महाआरती एवं महाप्रसाद का वितरण किया गया।

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