✍️ कांतिलाल मांडोत कलम से ….
जिसमे मानवता नही,सदाचार की गंध नही है,वह भले ही बढ़िया वस्त्र पहन ले,रत्नों के आभूषण से तन चमका दे,पर सदाचार के अभाव में मुर्दा है,मुर्दा सड़ता है,वह लड़ नही बल्कि जिंदा व्यक्ति चलता है,लड़ता है।वही दशा उन मानवों की है,जो सदाचार का दिवाला निकालकर ऊपरी श्रृंगारों से सुशोभित होते है। रावण में इसी बात की कमी थी,वह संग्रह ही संग्रह करने में रह गया,किन्तु त्याग नही कर सका।वह धोखे में है।वह जन विरोधी है।वह देश के लिए अभिशाप है।आज तो हम देखते है भाई से भाई झगड़ते है।एक दूसरे को ऊंच नीच की दृष्टि से देखते है।एक दूसरे को धोखा देते है।राम ने तो अपना राज्य छोड़ दिया था और आज तो मेम्बरी के लिए कुर्सी के लिए लडा जा रहा है।राम के देश में सत्ता का नग्न तांडव हो रहा है।मौत ,मुकदमा और बीमारी से आदमी घबरा जाता है।मकान की कमी और महंगाई से भी घबराता है।जब मंदी आ जाती है तो व्यापारी घबरा जाता है।रावण ने अपना जीवन नष्ट कर दिया पर अपनी राजलिप्सा को नही त्याग सका।राम का जीवन मंजा हुआ जीवन था।उनके जीवन मे त्याग था।पिता और पुत्र ने एक दूसरे के लिए त्याग किया।भाई ने भाई के लिए त्याग किया।पत्नी ने पति के लिए त्याग किया।यह है राम के जीवन का आदर्श।क्या हमारे जीवन मे भी ऐसा आदर्श है?आज हम एक पैसे का भी त्याग नही कर सकते तो कैसे हम दूसरों के लिए त्याग करेंगे।जब हम अपने जीवन की घबराहट को नही मिटा सकते तो कैसे हम दूसरों के जीवन को ऊंचा बनाएंगे?आज की स्थिति तो बड़ी विचित्र है।अपने जीवन को न देखकर दुसरो के जीवन की और झांकते है।मानव भव को दुर्लभ मानने का कारण भी यही है कि मानव आत्मा का विकास करके मोक्ष की और कदम बढ़ा सकता है।यह जन्म मरण के चक्कर से स्वयं को मुक्त कर सकता है ।यह जीवन जो कि मानव को मिला है वह जितना सहज समझा जाता है उतना है नही।उसके लिए उसने अपने पूर्व जन्म में अवश्य ही पुण्य कार्य किये होंगे, तभी उसे यह जीवन प्राप्त हुआ है।अब यदि मानव अपने पुण्योदय का लाभ न उठाकर पुनः भोग विलास में जीवन के सुनहरे पल व्यतीत कर रहा है तो उसे अंत मे पछताना पड़ेगा।जिसने जन्म लिया है,उसे एक दिन मरना अवश्य है,वह एक दिन दब्बे पांव आकर देह से आत्मा को अलग कर देंगी।यह देह ही है जिसके द्वारा दुनिया मे नेक काम किये जा सकते है।देह से आत्मा के अलग होने पर वह निर्जीव बन जाएगी।जिन्हें हम अपना मानते है वे भी मृत देह से घृणा करने लग जाएंगे।राजा हो या भिखारी, चक्रवर्ती सम्राट हो या इंद्र, काल को कोई रोक नही पाया है।राम,कृष्ण भी काल के हाथों नही बच सके। भीष्म जिन्हें कि इच्छा मृत्यु का वरदान था वे भी काल के ग्रास बने,फिर सामान्य व्यक्ति की तो ताकत ही क्या है जो मृत्यु का ग्रास बनने स्व बच जाये?मृत्यु तो एक रास्ता है जिस पर प्रत्येक जीव को एक दिन अवश्य चलना होगा।मृत्यु से डरकर चाहे कोई सात तालों के कमरे में छिप जाये, मृत्यु उसे ढूंढ ही लेगी।अच्छे कर्म करोगे तो जीवात्मा के पुण्य संचय होंगे और ऐसा नही कर पाये तो जीवन का प्राप्त होना निरर्थक हो जाएगा।अपने आप पर आपको पछतावा भी हो सकता है कि हमे समय मिला है और हम उसका उपयोग नही कर पाये और आजकल के चक्कर मे इस अमूल्य जीवन को यू ही खो दिया।वर्तमान युग मे बढ़ती हुई समस्याओं का एक बहुत बड़ा कारण जीवन मे सादगी का अभाव भी है।इच्छाओं आकांक्षाओ पर नियंत्रण न होने से हम सुख सुविधाओं की और बढ़ते जा रहे है।आज का आदमी येनकेन प्रकारेण वैभव की अथाह सामग्री जुटा लेने का प्रयास कर रहा है।वर्तमान की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने मानव मन की मनोवृत्ति को बिगाड़ दिया है।उसके विचार संकुचित हो गए है।विवेकशून्य होने से उस और दौड़ रहा है,जिधर आगे दल दल है।मन पर नियंत्रण न होने से इंद्रिया अलग अलग भाग रही है,जब तक मन का नियंत्रण नही होगा,आत्मा का कल्याण असंभव है।आत्मा तो स्वयं ज्ञान मय है,क्या अच्छा है और क्या बुरा वह सब जानती है।एक नन्ने से बालक को हम कुनैन की कड़वी गोली खिलाईये, वह मुह में रखते ही थूक देगा।उसको जब मीठी गोली देंगे तो वह उसे चूसने लगेगा।उसको कटु और मधुर ज्ञान है,उसने वह किसने सिखाया?उसी प्रकार आत्मा को भी सीखने की जरूरत नही होती है।महात्मा गांधी ने करोड़ो भारतीयों को नंगे बदन देखकर अपने जीवन को ही बदल लिया।शरीर पर एक ही धोती,उसे वे आधी पहनते और आधी ओढ़ते थे।आजादी के आंदोलन के समय लंदन में गोलमेज सम्मेलन का आयोजन हुआ।गांधी जी को कांग्रेस ने अपना मुख्य प्रतिनिधि बनाकर भेजा तो ब्रिटिश सरकार ने आक्षेप किया कि गोलमेज सम्मेलन में भाग लेते समय गांधी अपनी वेशभूषा बदलनी होगी।गांधी अपने विचारों पर दृढ़ थे।उन्होंने कहा कि मेरे कहने पर अपने नही बुलाया है।आपने मुझे निमंत्रण देकर बुलाया है।सम्मेलन में भाग लेने के लिए मैं अपने सिद्धांतों की बलि नही दे सकता।मजबूरन ब्रिटिश सरकार को गांधी की बात माननी पड़ी।सादा जीवन उच्च विचार की यह बहुत बड़ी जीत थी।








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