
धरणेन्द्र जैन (खैरवाड़ा)
खैरवाड़ा। धरणेन्द्र जैन। श्री वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर भूधर नजदीक विश्व प्रसिद्ध जैन तीर्थ श्रीकेशरियाजी से मात्र 5 किमी की दूरी पर स्थित हैं। यहाँ मुलनायक् श्री 1008 वासुपूज्य भगवान की अति प्राचीन अतिशयकारी प्रतिमा जी हैं।जो अनेक चमत्कारों से जुड़ी है। विक्रम संवत 930 मे कार्तिक शुक्ल पक्ष दशमी के पावन दिन आचार्य शुभ किर्ति जी द्वारा प्रतिष्ठित भगवान की महामंगलकारी श्वेतवर्णी प्रतिमा जी हैं। जो कि 1151 वर्ष प्राचीन हैं । यही पर श्री 1008 शीतलनाथ भगवान की 450 वर्ष प्राचीन प्रतिमाजी भी मंदिर के रंगमंडप मे विराजमान हैं। बताया जाता है कि पूर्व मे परीकर युक्त 24 जिनबिम्ब सहित यह प्रतिमा जी थी। किवदंती अनुसार पादेडी ग्राम से लाकर भूधर में विराजमान की गई थी । परिस्थिति अनुसार उस समय प्रतिमा जी का आसन और अष्ट प्रातिहार्य युक्त परिकर को मंदिर जी में ही अलग विराजमान कर दिया गया । परिकर की अन्य प्रतिमा जी गर्भगृह में स्थापित कि गई। डिजिटल तकनीक का उपयोग करके आज आपके सामने प्रतिमा जी का मूल स्वरूप प्रस्तुत किया गया हे। धन्य हे वो कुटुंब जिन्होंने 450 वर्ष पूर्व इतनी अलौकिक प्रतिमा जी का निर्माण कराया और हम सौभाग्य शाली हैं जो यह विरासत हमे प्राप्त हुई है। इतिहास में है कि प्रतिमा जी वाव जाती के महाजन द्वारा बनवायी गई थी, किवदंती अनुसार प्रतिमा जी पर लोगों द्वारा पत्थर आदि फेंककर अशातना की जाती थी, जिस कारण प्रतिमा जी को भूधर के जैन समाज द्वारा लाकर भूधर मंदिर मे विधि द्वारा जैन मंदिर मे स्थापित किया गया । शिलालेख के अनुसार जवास के भट्टारक श्री उदयसेन के शिष्य त्रिभुवन कीर्ति एवं आचार्य श्री जयसेन द्वारा प्रतिमा की 454वर्ष पूर्व (विक्रम संवत 1627 में ) श्री काष्ठा संघ में प्रतिष्ठित की गई । वाव जाती के श्रेष्ठि महाजन धारा शा एवं पुत्र लिम्बा शा, परबत शा, सारंग शा व उदा सा, मेघा सा, श्रीपाल शा, वास्तुपाल शा, रायमल शा,वेला सा, वाका सा,गोरा सा,जगा सा,थाऊआ सा, जगला सा,टारियो सा, तथा समस्त कुटुंब परिवार द्वारा बनवाई गई थी । प्रतिमा जी के आकार एवं कला को देखकर इस परिवार के अत्यंत संपन्न होने अथवा पूर्व में विशाल बस्ती होने के संकेत मिलते हैं । प्रतिमा जी के साथ नेमिनाथ, पार्श्व नाथ, सुपर्श्वनाथ एवं तीर्थंकर भगवान की प्रतिमाएँ हैं । दोनों प्रतिमाजी अति प्राचीन हे शिलालेख प्राकृत भाषा में हे जिसका अध्ययन निरंतर चल रहा हैं।
भूधर समाज के अध्यक्ष विनोद कोठारी ने बताया की विगत 50 वर्षो मे करीब 70 परिवारों का पलायन भूधर से हो चुका हैं। भगवान के आशीर्वाद से जैन समाज भूधर द्वारा यह पहल की गई है कि समाज के धर्मप्रेमी बंधुओं को जोड़ कर ऐसी प्राचीन प्रतिमाओ के दर्शन और भक्ति लाभ प्राप्त कराएँ। इसी क्रम में मंदिर जी में नियमित रूप से शांतिधारा भी की जाती हे । समाज अध्यक्ष ने बताया कि मूल उद्देश्य यही हे की आप इस प्राचीन जिनालय से जुड़ें और धर्मलाभ प्राप्त करें। यहा की छोटी सी इस समाज का एक बड़ा प्रयास है, इस विरासत के महत्व को समझकर एवं इसके सरक्षण मे अपना सहयोग दे सकते हे।









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