धन से सुख की सामग्री खरीद सकते है, किंतु शांति नहीं
जैसे जैसे लोभ होता जाता है वैसे-वैसे लोभ बढ़ता जाता है। तृष्णा आकाश के समान अनंत है। जीवन का अन्त निश्चित है। परंतु लोभ का नहीं। लोभ में वशीभुत होकर मानव जीवन स्वाह कर देते है। त्रिलोक की संपति देकर भी मानव जन्म का एक एक पल नही खरीदा जा सकता है।संपति देकर भी एक … Read more
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