
लम्बित हुई ‘न्याय की उम्मीद’, सम्मन, तामील, चालान अटके
न्यायिक कार्य बाधित रहने से सैकड़ों पक्षकार हो रहे हैं परेशान
खैरवाड़ा (धरणेन्द्र जैन)। अगर राज्य सरकार अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक कर्मचारियों की मांगों को मानकर कर्मचारियों का कैडर पुनर्गठन करती है तो सरकार पर एक रूपए का भी अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। राज्य सरकार की हठधर्मिता की वजह से न्यायिक कर्मचारियों में गहरा रोष है और प्रदेशभर के न्यायालयों में ‘न्याय की उम्मीद’ लम्बित और धुमिल होने से हजारों पक्षकारों को पिछले सात दिनों से परेशान होकर मायूस लौटना पड़ रहा है।
ये विचार न्यायिक कर्मचारी रीडर राजेन्द्रकुमार नायक ने बुधवार को खेरवाड़ा न्यायालय परिसर में आन्दोलनरत कर्मचारियों को संबोधित करते हएु व्यक्त किए। प्रदेश न्यायिक कर्मचारी संघ के बैनर तले चल रहे आन्दोलन के सातवें दिन हुई सभा में उन्होंने कहा कि न्यायिक कर्मचारियों की कैडर पुनर्गठन की मांगों को लेकर मई 2023 में राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने प्रस्ताव पारित कर राज्य सरकार को भेजा था लेकिन राज्य सरकार द्वारा हठधर्मिता का परिचय देते हुए उस पर कोई कार्यवाही नहीं करने से प्रदेशभर के न्यायिक कर्मचारी पिछले सात दिनों से लगातार अनिश्चितकालीन अवकाश पर हैं, जिससे न्यायालयों में न्यायिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। संघ के न्यायिक कर्मचारी हेमेन्द्र आचार्य एवं नीलेश रावल ने कहा कि सभी कर्मचारी राज्य सरकार द्वारा मांगे नहीं मानी जाने तक लगातार अनशन जारी रखा जाएगा और न्यायिक कार्यों में कोई सहयोग नहीं करेंगे। सभा में दिनेश जगरिया ने कहा राज्य सरकार ने अन्य सभी कार्यालयों के कर्मचारियों का कैडर पुनर्गठन करीब दो साल पहले ही कर दिया है लेकिन केवल अधीनस्थ न्यायालयों के कर्मचारियों के साथ ही सौतेला और दोहरा रवैया अपनाया जा रहा है, जो कतई बर्दाश्त नहीं है।
इससे पूर्व सभी कर्मचारी अपने-अपने न्यायालयों के रीडर के नेतृत्व में न्यायालय सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्टेªट खेरवाड़ा के बाहर एकत्र हुए, जहां सभा का आयोजन कर हाथों में तख्तियां लेकर राज्य सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और संघर्ष को तेज करने की चेतावनी दी। इस दौरान संघ के कृष्णपालसिंह शेखावत के नेतृत्व में सभी आन्दोलनरत कर्मचारियों ने कोर्ट परिसर में नारेबाजी कर अपनी मांगों को दोहराते हुए कहा कि न्यायिक कर्मचारियों की कोई मांग ऐसी नहीं है, जिससे राज्य सरकार के खजाने पर कोई बोझ पड़ रहा हो, फिर भी राज्य सरकार द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रस्तावों की अनदेखी करना एक संवैधानिक संस्था के आदेशों की अवहेलना है। इस कारण न्यायालयों में सम्मन, तामील, चालान और परिवादों तक पर सुनवाई नहीं होने से वादकार परेशान हो रहे हैं, जिसकी जिम्मेदार राज्य सरकार है।
सभा में नारायणलाल पटेल, कृष्णपालसिंह शेखावत, महेश चौधरी, सीमा मीना, ज्योति चौहान, नवरतन बैरवा, योगेशकुमार बैरवा और अनिल चौधरी ने भी विचार व्यक्त कर राज्य सरकार के रवैये के खिलाफ गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए सभी कर्मचारियों से संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया। सभा में बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने भी विचार व्यक्त करते हुए न्यायिक कर्मचारियों को न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए सहयोग व सर्मन दिया और राज्य सरकार से कर्मचारियों की मांगों पर त्वरित सुनवाई कर पक्षकारों व कर्मचारियों को राहत देने की मांग की।








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