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रुण्डेड़ा का ऐतिहासिक पर्व ‘रंग तेरस’ : मेवाड़ की शौर्य गाथा और संस्कृति का अनुपम संगम इस बार 26 मार्च को

जहां एक ही दिन में होती है होली और दीपावली, जहां परंपराएं नहीं, बल्कि गौरवशाली इतिहास जीवंत होता है


वल्लभनगर (कन्हैयालाल मेनारिया बासड़ा)!22 मार्च ! राजस्थान की वीरभूमि मेवाड़, जहां की मिट्टी में शौर्य की गाथाएं लिखी गईं, जहां की हवाओं में आन-बान-शान की खुशबू बसी है, और जहां के गांव-गांव में संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता के अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। इसी मेवाड़ की धरती पर स्थित रुण्डेड़ा गांव अपने गौरवशाली इतिहास और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस गांव की सबसे खास पहचान है रंग तेरस पर्व, जिसे बीते 458 वर्षों से मनाया जा रहा है, जो इस बार 26 मार्च को मनाया जाएगा। यह रंग तेरस महोत्सव केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह मेवाड़ की अस्मिता, समाज की एकता, धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का अनुपम संगम है। इस पर्व में इतिहास जीवंत हो उठता है,जब इस गांव की गलियों में रंगों की वर्षा होती है, ढोल और मादल की गूंज उठती है और रात के अंधकार में रंग बिरंगी सतरंगी लाइटों की रोशनी बिखर जाती है।

तड़के 4 बजे शुरू होता है महोत्सव

गांव में सुबह चार बजे ही एड़ा के ढोल की गूंज पूरे गांव के माहौल को उत्साह और ऊर्जा से भर देगी। यह वही ढोल है, जिसकी आवाज सुनकर पिछली साढ़े चार सदियों से यह परंपरा जीवंत होती आ रही है। यह ढोल केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि यह ऐतिहासिक परंपरा का उद्घोष है। जब यह बजता है, तो पूरा गांव जाग जाता है और हर व्यक्ति जान जाता है कि आज रंग तेरस का पर्व है। इसके बाद पूरे गांव में रंग और उमंग का ज्वार उमड़ पड़ता है। जैसे ही 12 बजे दोपहर होते हैं, गांव के उत्तर दिशा में स्थित जत्तीजी श्री कलदास जी महाराज की धूणी पर गांव के तीनों प्रमुख समाज मेनारिया, जाट और जणवा के पंच अपने-अपने ढोल, थाली और मादल के साथ पहुंचते हैं। वहां धूनी पर पूजा-अर्चना होती है और जत्तीजी महाराज को इस महोत्सव में आमंत्रित किया जाता है। बावजी आते हे और कुएं के फेरे में करीब आधा घंटे कीचड़ में लोट पोट होते हे जिसे स्थानीय भाषा में भरूड़िए आना कहा जाता है। इसके बाद ढोल के साथ ग्रामीण वहा से रवाना होकर रास्ते में डेमण बावजी को भी इस पर्व के लिए आमंत्रित करते हैं और फिर गांव के बड़े मंदिर पर पहुंचते हैं, जहां भांग लेने की रस्म पूरी की जाती है। भांग लेने के बाद बड़े मंदिर में रखी जतीजी महाराज की अमानत चिमटा, माला और घोड़ी को लेकर सर्व समाज का सामूहिक गैर नृत्य की तैयारी शुरू हो जाती है।


रंगों की बौछार, ढोल की थाप और मेवाड़ की शौर्य परंपरा का जीवंत स्वरूप

गेर नृत्य रुण्डेड़ा की शान है। यह केवल नृत्य नहीं, सामाजिक एकता उल्लास और संस्कृति का उत्सव है। बड़े मंदिर से गैर नृत्य शुरू होता है जहा से गांव के सर्व समाज के लोग गैर नृत्य करते हुवे तलहटी मंदिर, निंबड़िया बावजी मंदिर और जूना मंदिर होते हुए लक्ष्मीनारायण मंदिर आ जाते है। इस दौरान पूरा गांव रंगों की वर्षा में सराबोर हो जाता है और ढोल-थाली की थाप पर युवा, बुजुर्ग और बच्चे सब झूमने लगते हैं। गैर नृत्य के बीच में गोले में महिलाओं का घूमर नृत्य होता हे और बाहर पुरुष गैर नृत्य करते है इन दोनो के बीच जति जी महाराज का चिमटा और माला और घोड़ी लेकर उनके अनुयायी नृत्य करते है।

गेर नृत्य के दौरान रंगों की बौछार के साथ एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है—युवाओं की टोलियां ग्रामीणों को उठाकर मंदिर के पीछे बनाए गए कीचड़ के गड्ढे में डालती हैं।

क्या है इस परंपरा का रहस्य

पुराने लोग यह मानते थे की कीचड़ में लोटपोट होने के बाद सभी एक जैसे दिखाई देने लगते हे उनमें न कोई अमीर दिखता हे न गरीब और न कोई ऊंचा न नीचा सभी एक समान हो जाते हे जो एक सामाजिक एकता को दर्शाती है और परंपरा के पीछे एक मान्यता यह भी है कि  कीचड़ शुद्धिकरण का प्रतीक है और इससे नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। लक्ष्मी नारायण मंदिर चौक पर गैर नृत्य करने के बाद आगे महादेव मंदिर और जणवा मंदिर होते हुए वापस बड़े मंदिर पहुंचते है, जहां जती जी महाराज की अमानत फिर से मंदिर में रख दी जाती है और दिन का कार्यक्रम समाप्त होता है।

रंग तेरस का भव्य भोज: जब हर घर में बनते हैं विशेष पकवान

रंग तेरस के दिन गांव का हर घर अतिथियों के स्वागत के लिए तैयार रहता है। इस दिन शाम को हर घर में मीठी भुजिया, पकोड़ी, मक्के के पापड़, आलू बड़ा और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। गांव में बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए लक्ष्मीनारायण मंदिर चौक के पास विशेष चाय काउंटर लगाया जाता है, जहां लोग चाय की चुस्कियों के साथ इस ऐतिहासिक पर्व का आनंद लेते हैं। इस दिन देश विदेश में कार्यरत गांव के लगभग सभी युवा गांव आ जाते है। इस महोत्सव के दिन गांव में पुराने यार मिल जाते हे जो रोजगार के चक्कर में देश विदेश में रहते हे और मिलना नहीं हो पाता हे।
रंग तेरस पर्व पर लगभग गांव के सभी लोग गांव आ जाते हे और इस त्योहार को मिलजुल कर मनाते हैं।

रात में मेवाड़ की वीर गाथा जीवंत होती है

शाम होते ही गांव के तीनों समाज—मेनारिया समाज (लक्ष्मीनारायण चौक), जणवा समाज (चारभुजा चौक) और जाट समाज (बावड़ी चौक) में एकत्रित होते हैं। रात करीब 9 बजे से पारंपरिक ढोल और थाली की ताल पर गेर नृत्य फिर से शुरू होता है। पुरुष सफेद कुर्ता और धोती पहनते हैं, सिर पर लाल पगड़ी सजाते हैं, जिसमें मोर कलंगी लगी होती है। कमर पर कटार धारण की जाती है। इसके बाद तलवारबाजी, पट्टा नृत्य, आग के गोलों से खेल, नेजा (भाला प्रदर्शन) जैसे रोमांचक कार्यक्रम होते हैं। इस दृश्य को देखकर लगता है मानो इतिहास फिर से जीवंत हो गया हो। यह आयोजन सुबह 4 बजे तक चलता है और इसका समापन आतिशबाजी और तोप चलाकर किया जाता है।

‘नैजा’ रस्म: रोगों से बचाव की अनूठी परंपरा

रंग तेरस के समापन के बाद गांव की महिलाएं दो पंक्तियों में खड़ी होती हैं और उनके हाथों में आक (मदार) की टहनियां होती हैं। पुरुष इस पंक्ति के बीच से निकलते हैं और महिलाएं उन पर आक की टहनियों से वार करती हैं। मान्यता है कि इस रस्म से व्यक्ति पूरे वर्ष बीमार नहीं पड़ता और नकारात्मक शक्तियों से उसकी रक्षा होती है।

रुण्डेड़ा की गेर नृत्य को मिली राष्ट्रीय पहचान

रुण्डेड़ा के गेर नृत्य को राजस्थान दिवस पर आयोजित प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त हो चुका है। गांव के युवा जयपुर, मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं, जिससे रुण्डेड़ा के गेर नृत्य को राष्ट्रीय पहचान मिली है।

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