
उदयपुर/भीलवाड़ा। जब शब्द साधना बन जाते हैं और कविता किसी का जीवन दर्शन, तब जन्म होता है एक ऐसी शख़्सियत का जो महफ़िलों की रौनक भी है और अकादमिक जगत का स्तंभ भी। भीलवाड़ा के प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षाविद और गज़लकार डॉ. अवधेश कुमार जौहरी को आगामी 8 अप्रैल को ‘शायराना उदयपुर सम्मान 2025’ से नवाज़ा जाएगा। यह सम्मान महज़ एक प्रशस्ति पत्र नहीं, बल्कि उस अनवरत तपस्या की स्वीकृति है जो डॉ. जौहरी ने हिंदी साहित्य की सेवा में अर्पित की है।
शायराना उदयपुर : जहां दीवारें नहीं, केवल दिल मिलते हैं
पिछले 15 वर्षों से उदयपुर की आबोहवा में रूहानियत और अदब का रंग घोलने वाला ‘शायराना उदयपुर’ समूह आज एक वटवृक्ष बन चुका है। इस मंच की खूबसूरती इसकी समावेशी सोच में है। यह एक ऐसा संगम है जहाँ:
बाधाओं का अंत: जाति, धर्म, उम्र और भूगोल की सरहदें यहाँ आकर धुंधली पड़ जाती हैं।
साझा विरासत : यहां डॉक्टर, इंजीनियर, छात्र और गृहणियां—सब एक ही कतार में बैठकर साहित्य और अध्यात्म की अमृत बूंदें पीते हैं।
जीवन का उत्सव : यहाँ कविता केवल कागज़ पर नहीं लिखी जाती, बल्कि इसे जिया जाता है।
डॉ. जौहरी : गज़ल के शिल्पकार और ज्ञान के पुंज
राजकीय कन्या महाविद्यालय, माण्डल में अध्यापन कर रहे डॉ. जौहरी का व्यक्तित्व उस पारखी जौहरी की तरह है जो शब्दों के पत्थरों को तराश कर उन्हें गज़ल का हीरा बना देते हैं। उनका विश्लेषण करें तो उनकी यात्रा के तीन मुख्य आयाम उभरते हैं:
अकादमिक गहराई : 11 शोधार्थियों को पीएचडी कराना और 15 पुस्तकें लिखना उनकी विद्वत्ता का प्रमाण है। “आहों का अनुवाद” जैसे संग्रह यह बताते हैं कि वे केवल छंद नहीं रचते, बल्कि समाज के दर्द को शब्दों में ढालते हैं।
मंच की जादुई निज़ामत : 150 से अधिक कार्यक्रमों का संचालन करना यह दर्शाता है कि उनके पास श्रोताओं की नब्ज़ पकड़ने का हुनर है। उनकी आवाज़ में वो कशिश है जो बिखरी हुई महफ़िल को एक सूत्र में पिरो देती है।
डिजिटल सेतु : फेसबुक और यूट्यूब जैसे आधुनिक मंचों पर ‘हिंदी की दशा और दिशा’ पर संवाद कर वे नई पीढ़ी और पुरानी परंपरा के बीच एक मज़बूत पुल का काम कर रहे हैं।
क्यों खास है यह सम्मान?
यह सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘भीलवाड़ा की प्रतिभा’ का ‘उदयपुर की सांस्कृतिक विरासत’ से मिलन है। 8 अप्रैल को होने वाला यह आयोजन केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस हिंदी भाषा का उत्सव है जो हमें जोड़ती है। डॉ. जौहरी जैसे साधक जब सम्मानित होते हैं, तो हर उस युवा रचनाकार को उम्मीद मिलती है जो चुपचाप अपनी कलम से क्रांति लिख रहा है।
“गज़ल के मिसरों में जब रूह का अक्स उतरता है, तब जाकर कोई ‘अवधेश’ बनता है।” 8 अप्रैल का दिन राजस्थान के साहित्यिक इतिहास में एक सुनहरे अध्याय के रूप में दर्ज होगा, जब ‘शायराना उदयपुर’ की महफ़िल डॉ. जौहरी के सम्मान में सजेगी।








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