

उदयपुर ,दिनांक 29 मार्च | जनमत मंच के त्वावधान में 1857 की क्रांति के महानायक मंगल पांडे विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन हुआ ।
इस अवसर पर जनमत मंच के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि-आजादी की लड़ाई के अगदूत कहे जाने वाले मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 ई. को उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे एवं माता का नाम श्रीमती अभय रानी था। उनका जन्म एक सामान्य ब्राह्मण परिवार हुआ था।
1849 ई.में वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वार्थी नीतियों के कारण मंगल पांडे के मन में अंग्रेजी हुकुमत के प्रति नफरत शुरू हो गई थी। जब कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में ‘एनफील्ड पी.53’ राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ तो इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है जो कि हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए गंभीर और धार्मिक विषय था। इस अफवाह ने सैनिकों के मन में अंग्रेजी सेना के विरूद्ध आक्रोश पैदा कर दिया। इसके बाद 9 फरवरी 1857 ई. को जब यह कारतूस, देसी पैदल सेना को बांटा गया तो मंगल पाण्डेय ने कारतूस लेने से इनकार कर विद्रोह कर दिया। इस बात से नाराज अंग्रेज अफसर द्वारा मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लेने और वर्दी उतरवाने का आदेश दिया जिसे मानने से मंगल पांडे ने इनकार कर दिया। मंगल पांडे ने राइफल छीनने के लिए आगे बढ़ने वाले अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन पर आक्रमण कर दिया और मंगल पांडेय ने बैरकपुर छावनी (कलकता) में 29 मार्च 1857 ई.को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया।
इतना ही नहीं मंगल पांडे ने रायफल से उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद मंगल पांडे ने उनके रास्ते में आए एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉब को भी मौत के घाट उतार दिया। इस घटना के बाद उन्हें अंग्रेज सिपाहियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 ई.को फांसी की सजा सुना दी गई।
फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 ई.को फांसी दी जानी थी, लेकिन अंग्रेजों द्वारा मंगल पांडे को दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल 1857 ई.को फांसी दे दी गई।
अतः 1857 ई. में भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वो ईस्ट इंडिया कंपनी की 34 वीं बंगाल नेटिव इंफेन्ट्री के सिपाही थे। तत्कालीन अंग्रेजी शासन ने उन्हें बागी करार दिया, जबकि आम हिंदुस्तानियों ने उन्हें आजादी की लड़ाई के नायक के रूप में सम्मान दिया। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में सन् 1984 में डाक टिकट जारी किया।
मंगल पांडे द्वारा विद्रोह किए जाने के एक महीने बाद ही 10 मई को मेरठ की सैनिक छावनी में भी बगावत हुई और यह विद्रोह देखते-देखते पूरे उत्तर भारत में फैल गया। मंगल पांडे की शहादत की खबर फैलते ही अंग्रेजों के खिलाफ जगह-जगह विद्रोह भड़क उठे, हालांकि अंग्रेज इसे काबू करने में कामयाब रहे लेकिन मंगल पांडे द्वारा लगाई गई यह चिंगारी आजादी की लड़ाई का मूल बीज साबित हुई। यह विद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, जिसमें सिर्फ सैनिक ही नहीं, राजा-रजवाड़े, किसान, मजदूर एवं अन्य सभी सामान्य लोग शामिल हुए। इस विद्रोह के बाद भारत पर राज्य करने का अंग्रेजों का सपना उन्हें कमजोर होता नजर आया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इतिहासकार डॉ. जमनेश कुमार ओझा ने बताया कि-मंगल पांडे द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जो बगावत की वह जल्दबाजी थी, उनको पूरी तरह से धैर्य के साथ संगठित होकर आंदोलन करना चाहिए था। हो सकता है कि हमें जो स्वतंत्रता बाद में मिली वह स्वतंत्रता हमें 1857 की क्रांति के समय ही मिल जाती। लेकिन यह भी सही है कि मंगल पांडे के योगदान को बुलाया नहीं जा सकता।
मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने मंगल पांडे की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, एक हिंदू के रूप में उन्होंने गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूसों का उपयोग करने से इनकार कर दिया, जिसे उन्होंने अपने धर्म और सम्मान के विरुद्ध माना।
29 मार्च 1857 को बैरकपुर में,उन्होंने अकेले ही अंग्रेज अधिकारियों पर हमला कर दिया और विद्रोह का बिगुल फूंका, यह जानते हुए भी कि इसका परिणाम मृत्यु हो सकता है। मातृभूमि को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया। और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई।
उनके बगावती तेवर ने 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के अन्य सैनिकों को भी अंग्रेजी सेना के खिलाफ विद्रोह के लिए प्रेरित किया, जिससे यह विद्रोह देश भर में फैल गया।
इस अवसर पर मंच के सह सचिव डॉ. प्रियदर्शी ओझा एवं डॉ.कुणाल आमेटा ने भी अपने विचार रखें और बताया कि-मंगल पांडे ने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर अपनी जान की परवाह न करते हुए कर्तव्य का पालन किया, जिससे वे भारतीय इतिहास में अमर हो गए।








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