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अमेरिका – इजराइल और ईरान के मध्य चल रहे युद्ध का वैश्विक स्तर पर प्रभाव -डॉ. श्रीनिवास महावर

उदयपुर! जनमत मंच के तत्वाधान में अमेरिका- इजरायल और ईरान के मध्य चल रहे युद्ध का वैश्विक स्तर पर प्रभाव विषय पर संगोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि, 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु व सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले कर युद्ध की शुरुआत की। इस संघर्ष में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु हो गई और ईरानी ठिकानों को भारी नुकसान होने से मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है। इस युद्ध से होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान, वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि और अब तक हजारों लोगों मारे जा चुके हैं । इनमें से मरने वाले, लोगों में ईरान के लोग की संख्या अधिक है।
   जनमत मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया की 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ के तहत ईरान के खिलाफ समन्वित सैन्य अभियान शुरू किया जिसका कारण वर्षों से बढ़ता तनाव, 2015 की परमाणु संधि (JCPOA) के टूटने के बाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम, और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर ईरान समर्थित समूहों के हमले थे।
इस प्रकारअमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम को निशाना बनाया। जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से जवाबी हमले किए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबी हमलों में मृत्यु हो गई।
युद्ध के प्रमुख प्रभावो पर प्रकाश डालते हुए मंच के सह सचिव डॉ. प्रियदर्शी ओझा ने बताया कि,
वैश्विक ऊर्जा संकट: ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की चेतावनी दी है, जहाँ से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। इससे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका है।
• क्षेत्रीय अस्थिरता: लेबनान और ईरान में व्यापक तबाही हुई है। संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में यात्री फंसे हुए हैं और युद्ध के और फैलने का खतरा है।
• आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव: अमेरिका के नेतृत्व में ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था पर इसका विनाशकारी असर पड़ रहा है, जिससे दवाइयों और भोजन की कमी के हालात बन गए हैं।
मंच के सहायक सचिव विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि ,यह युद्ध सीधे तौर पर अमेरिका की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो पहले की कूटनीतिक कोशिशों के विफल होने के बाद शुरू हुआ। वर्तमान में चल रहे मध्य पूर्व (इजरायल-ईरान/हमास) युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा है, और समुद्री व्यापार मार्ग बाधित होने से शिपिंग लागत में वृद्धि हो रही है, जिससे भारत की GDP पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
युद्ध के प्रमुख प्रभाव: पर प्रकाश डालते हुए
डॉ. कुणाल आमेटा  ने बताया की , भारत अपनी जरूरत का लगभग तेल आयात करता है, और युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ने से ईंधन, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं।
व्यापार में बाधा: रेड सी और होर्मुज की खाड़ी के पास तनाव के कारण जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है और सप्लाई चेन टूट रही है।भारतीयों की सुरक्षा: खाड़ी देशों में काम करने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों के लिए सुरक्षा और रोजगार का संकट पैदा हो गया है। आर्थिक अनिश्चितता: इस संघर्ष के लंबे खिंचने से वैश्विक आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है और व्यापार घाटा बढ़ सकता है।
मानवीय संकट: युद्ध के कारण निर्दोषों की जान जा रही है, बुनियादी ढांचा नष्ट हो रहा है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए अनिश्चितता व मनोवैज्ञानिक आघात का माहौल बन रहा है।
मंच के कोषाध्यक्ष विशाल माथुर ने बताया कि ,इस युद्ध से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। जीव जंतु , पशु पक्षियों पर अनुकूल प्रभाव पड़ रहा है।
संक्षेप में, यह युद्ध भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के दृष्टिकोण से एक बड़ी चुनौती बन गया है।
मंच की सदस्य डॉ. पूनम पाठक ने बताया की वर्तमान में चल रहे विभिन्न युद्धों (जैसे यूक्रेन-रूस और मध्य पूर्व/ईरान-इज़राइल तनाव) के वैश्विक स्तर पर अत्यंत विनाशकारी और दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं। 2026 की शुरुआत तक, इन संघर्षों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को “तूफानी” मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
वैश्विक स्तर पर मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं:
1. ऊर्जा संकट और तेल की कीमतों में उछाल
• मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, विशेष रूप से ईरान-अमेरिका/इज़राइल तनाव के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से आपूर्ति बाधित हुई है। यह 1970 के दशक के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्ति संकट माना जा रहा है।
• ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100-$120 प्रति बैरल तक पहुँचने की आशंका जताई गई है, जिससे ईंधन की कीमतें पूरी दुनिया में बढ़ रही हैं।
2. वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) और आर्थिक मंदी
• युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला (supply chains) टूट गई है, जिससे कच्चे माल और परिवहन की लागत बढ़ गई है। OECD ने चेतावनी दी है कि युद्ध के कारण वैश्विक GDP वृद्धि के अनुमानों में कटौती की जा सकती है।
• उच्च ऊर्जा और खाद्य कीमतों के कारण दुनिया भर में मुद्रास्फीति बढ़ रही है, जिससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे अधिक बोझ पड़ रहा है।
3. खाद्य सुरक्षा (Food Security) का संकट
• यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण अनाज (गेहूं, मक्का) की आपूर्ति प्रभावित हुई है। चूँकि ये दोनों देश दुनिया के प्रमुख अनाज निर्यातक हैं, आपूर्ति बाधित होने से खाद्यान्न की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं।
• उर्वरक (fertilizers) की आपूर्ति में बाधा ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया है, जिससे अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में भूख का खतरा बढ़ गया है।
4. व्यापार में अनिश्चितता और भू-आर्थिक टकराव
• विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 2026 की रिपोर्ट ने भू-आर्थिक टकराव (Geoeconomic confrontation) को शीर्ष जोखिम बताया है।
• अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव, टैरिफ में वृद्धि और तकनीकी वर्चस्व की दौड़ ने वैश्विक व्यापार को अस्थिर कर दिया है।
5. मानवीय परिणाम और शरणार्थी संकट
• युद्ध क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा (घर, अस्पताल, स्कूल) तबाह हो गया है।
• यूक्रेन और मध्य पूर्व में जारी हिंसा के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, जिससे यूरोप और अन्य पड़ोसी क्षेत्रों में शरणार्थी संकट गहरा गया है।
संक्षेप में, ये युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास को धीमा कर रहे हैं (2026 में 2.7% की धीमी वृद्धि का अनुमान), मुद्रास्फीति को बढ़ा रहे हैं और एक लंबी आर्थिक मंदी का जोखिम पैदा कर रहे हैं। युद्ध के परिणाम अत्यंत विनाशकारी और दीर्घकालिक हो सकते हैं, जो समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति को गहराई से प्रभावि कर सकते है। इसके प्रमुख परिणामों में जन-धन की भारी हानि, बुनियादी ढांचे की तबाही, भुखमरी, शरणार्थी संकट, मनोवैज्ञानिक आघात और व्यापारिक व्यवधान शामिल हैं।  अतः इन युद्धों  को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोके जाने की पहल जानी चाहिए।

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